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समय और युग परिवर्तन के साथ क्यों बदल जाते हैं मनुष्यों के लक्षण

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार परम पिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के पश्चात कालखंड समय को चार युगों में बिभाजित किया था ,जिसे सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग के नाम से जाना जाता है ! हिंदू पुराणों की माने तो कालखंड का आरंभ सत्ययुग से हुआ और कलयुग पर आकर यह खत्म हो जाता है ! 

कलयुग की समाप्ति के बाद पुनः सत्ययुग के शुरू होता है और यह चक्र सृष्टि की रचना के समय से निरंतर चलता आ रहा है !लिंग पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना के पश्चात ब्रह्मा जी ने सबसे पहले खंड का नाम सतयुग रखा, इसके बाद के कालखंड का नाम त्रेता, द्वापर और फिर अंतिम कालखंड का नाम कलयुग रखा ! 

Table of contents

  1. सत्ययुग में मनुस्य का लक्षण
  2. त्रेतायुग में मनुस्य का लक्षण 
  3. द्वापर युग में मनुस्य का लक्षण 
  4. युग परिवर्तन के हिसाब से मनुष्य की लक्षण में परिवर्तन क्यों होते हैं
  5. कलयुग में मनुस्य के लक्षण
  6. युग परिवर्तन के साथ मनुष्य की लंबाई और आयु कम क्यों हो जाती है

सत्ययुग में मनुस्य का लक्षण

सतयुग में सभी मनुष्यों का एक ही धर्म होता है और वह धर्म है मनुष्य में कोई भी स्वार्थी नहीं होता ! सभी एक दूसरे की मदद किया करते हैं, इसयुग में  किसी भी मनुष्य को किसी भी तरह की कोई बीमारी नहीं होती थी ! मनुष्य अपनी सभी इंद्रियों को संयम में रख पाता है! कोई किसी के गुणों में दोष नहीं देखता ! इतना ही नहीं सत्ययुग में मनुस्य कभी भी दुखी नहीं होते, इसी वजह से उनकी आंखों से आंसू भी नहीं निकलते ! इस युग में ना किसी में घमंड होता है और ना ही कोई अन्य विकार !

सत्ययुग में मनुस्य आपस में लड़ते नहीं है और सभी प्रेम से रहते हैं !लिंग पुराण में आगे बताया गया है, कि सत्ययुग के मनुस्य बड़े ही पूर्तिले रहे होते हैं, आलस्य क्या होता है इस युग में लोग जानते ही नहीं 1 सत्ययुग के मनुष्यों की सबसे बड़ी खासियत यह हुआ करती है की ना तो किसी से दूअंनद करते  हैंन ही किसी से चुगली करते हैं और ना ही कोई एक दूसरे से बलवान समझता है !

सतयुग में सभी मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं,सत्ययुग में परब्रह्म परमात्मा के उद्देश्य से सभी बर्गो के मनुस्य अनुष्ठान कर सकते हैं, इसलिए सभी मनुष्यों का अधिकतर समय धर्म कर्म करने में ही व्यतीत होता है ! सब लोग परमात्मा के ही नाम का जप और उन्हीं की सेवा पूजा किया करते हैं ! इस युग में स्त्री और पुरुष में कोई भेदभाव नहीं किया जाता, सभी वर्णों के लोगों को शिक्षा, शास्त्र ,कला आदि क्षेत्रों में समान अवसर दिए जाते हैं ! 

स्त्रियां विवाह के बाद अपने पत्नी धर्म का निष्ठा से पालन करती है और हमेशा पति की सेवा में लगी रहती है ! बच्चे अपने माता-पिता का कहा मानते हैं और बुढ़ापे में खूब सेवा किया करते है  ! सत्ययुग के लोग के लोग समय-समय पर किए जाने वाले आश्रम संबंधी सत्कर्म का अनुष्ठान करके कर्म फल की कामना  और काम आसक्ति ना होने के कारण परमगति प्राप्त कर लेते हैं ! 

पुराणों की माने तो इस युग में मनुष्य की लंबाई 32 फुट हुआ करती है और मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार अपना शरीर त्याग सकते हैं ! सत्ययुग की काल अवधि 17लाख 28 हज़ार वर्ष बताई जाती है और जब यह काल अवधि समाप्त हो जाती है तो नई उनकी कालखंड का दूसरा युग त्रेतायुग आरंभ होता है !

त्रेतायुग में मनुस्य का लक्षण  

त्रेता युग में मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, लेकिन सत्ययुग के मनुष्यों की अपेक्षा खुद की इंद्रियों पर संयम नहीं रख पता है ! इस युग में मनुष्य धीरे-धीरे अपनों में सीमेंट लगता है यानि उनके अंदर स्वार्थ भावना पनपने लगता है ! इस युग में मनुस्य दूसरों की चुगली करने लगता है, साथ ही मनुष्य में इर्षा की भावना भी जागृत होने लगती है, हालांकि ऐसे मनुष्यों की संख्या काफी कम होती है! 

इस युग में समाज वर्णाश्रम की ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शुद्र में विभाजित होना शुरू हो जाता है, हलाकि सत्ययुग की अपेक्षा धर्म का लोप होने पर भी इस युग की स्त्रियां अपने धर्म का पालन करती है,  पुरुष भी अपनी पत्नी को धोखा नहीं देता ! 

संतान भी अपने माता-पिता की है i पुराणों की माने तो इस युग में मनुष्य की औसत आयु 10,000 वर्ष होती है और इस युग की कालावधी 12 लाख 96 हजार वर्ष होती है !इस कालखंड के समाप्त होने के बाद ही द्वापर युग की  शुरुआत होती है !

द्वापर युग में मनुस्य का लक्षण   

लिंग पुराण के अनुशार द्वापर युग में मनुस्य अपने कर्त्तव्य से दूर होने लगता है यानि की वो स्वार्थी होने लगता है ! इस युग में भौतिसुख की पूर्ति करने केलिए मनुस्य कई तरह के अधर्म करने लगता है और धर्म से दुरी बनालेता है !

जैसे जैसे द्वापर युग की कालावधी आगे बढ़ती है वैसे वैसे मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, ईशा जैसे दुर्गुणों से ग्रसित होने लगता है  ! इस युग में लोगों की पहचान से कर्म से नहीं होती बल्कि जन से की जाती है ! अर्थात इस युग में ब्राह्मण का बेटा ब्राह्मण, क्षत्रिय का बेटा क्षत्रिय, बैस्य की संतान वैश्य और शूद्र की संताने सूद्र ही कहलाती है! 

सतयुग की तरह इस युग में शूद्रों को वेद पढ़ने की आजादी नहीं मिलती और न ही क्षत्रियों की तरह शस्त्र चलाने की अर्थात द्वापर युग में सामाज जातियों में बट जाता है ! लोगों को दूसरों के साथ-साथ अपनों से भी इर्षा होने लगती है ! द्वापर युग का मनुष्य स्र्तीयों को अपनी संपत्ति समझ ने लगता है ! इस युग में  मनुष्य अपनी इंद्रियों पर संयम नहीं रख पाता ! 

समाज में कई तरह के अधर्म  होने लगते हैं,स्र्तीयों की इज्जत के साथ खेला जाता है और संतान भी अपने मां बाप की आदेश पालन नहीं करती ! और यही सारी बातें थी जिसके लिए महाभारत युद्ध भी हुआ था ! 

अगर दुर्योधन को सत्ता का लोभ नहीं होता तो अपने ही भाइयों पांडवों से ईर्ष्या नहीं करता ! एक स्त्री को भरी सभा में अपमान नहीं करता! लिंग पुराण के अनुशार युग में मनुस्य का आयु 1000 वर्ष हुआ करती है और इस युग की कालावधी 8 लाख 64हज़ार वर्ष होती है और इस अवधि के समाप्त होने पर ही कालखंड का अंतिम युग यानि कलयुग आरंभ होता है !

युग परिवर्तन के हिसाब से मनुष्य की लक्षण में परिवर्तन क्यों होते हैं


अब यह जानना आवश्यक है कि युग के हिसाब से मनुष्य में यह परिवर्तन कैसे होते हैं ! दरअसल सतयुग में धर्म का आधार 4 पैर पर होता है,जो त्रेता युग में  तीन पैर वाला, द्वापरयुग में  2 पैर वाला और कलयुग में केवल  एक पैर वाला रह जाता है ! 

धर्म के लोप होने के कारण मनुष्य की प्रवृत्ति में भी बदलाव होने लगता है !जिसकी बजह से मनुष्य में युग के हिसाब से काम,क्रोध,कलैस,शारीरिक रोग और दूअंद बढ़ने लगता है ! इसी अनुपात में वेद शास्त्रों को मनुष्य त्यागने लगता है! और अंतिम कालखंड जब कलयुग आता है तो कलयुग में मनुष्य माया असूया और तपस्यों का बद्ध करने लगते हैं !

कलयुग में मनुस्य के लक्षण

कलयुग में मनुष्य अधर्मी,कदाचारी, क्रोधी और अल्प बुद्धि वाले होते हैं ! इस युग में सभी अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ लेते हैं ! जैसे कि ब्राह्मण वेद पढ़ना छोड़ देते हैं, क्षत्रिय प्रजा की रक्षा नहीं करती, लोग गर्व में ही लड़कियों को मार देते हैं, इसे पुराण में भी भ्रूण हत्या कहा गया है! 

इस युग में चोर प्रवृत्ति के लोग भोलीभाली प्रजा पर शासन करते हैं, इस युग में लोग जप,तप और यज्ञ के फल को भी बेच देते है ! कलयुग की स्त्री हो या पुरुष कोई भी अपने धर्म का पालन नहीं करता ! इस युग में स्त्रियों का सम्मान ना के बराबर रह जाता है ! काम ,क्रोध, लोभ और स्वार्थ में वृद्धि के कारण हिंसात्मक घटनाएं बढ़ने लगती है ! 

लोग एक दूसरे से लड़ने रहते हैं,एक दूसरे की हत्या करने लगते हैं! संतान अपने माता पिता की सेवा नहीं करती, कलयुग में मनुष्य की लंबाई 5 से 7 फुट रह जाती है ! इसके साथ कलयुग में मनुष्य की औसत आयु 70,80 वर्ष रह जाती है! 

युग परिवर्तन के साथ मनुष्य की लंबाई और आयु कम क्यों हो जाती है

आखिर युग परिवर्तन के साथ मनुष्य की लंबाई और आयु कम क्यों होती जाती है ! लिंग पुराण में  बताया गया है कि जैसे-जैसे युग  परिवर्तित होता है, वैसे वैसे मनुष्य प्रकृति से दूर होता जाता है और भोग विलास में लीन होता जाता है ! जिसकी वजह से मनुष्य का शरीर कई तरह के रोगों से घिर जाता है और मनुस्य में काम, क्रोध, लोभ जैसे तामसीक गुण बढ़ने लगते हैं ! 

मनुस्य क्रोध और चिंता के सागर में डूब जाता है,जिस बजह से समय के साथ-साथ मनुष्य की लंबाई और आयु कम होने लगती है!  लिंग पुराने में कलयुग की अवधि को 4 लाख 32 हज़ार वर्ष बताया गया है, और जब यह अवधि समाप्त होती है तब सृष्टि के एक नए चक्र का आरंभ होता है और पुनः सत्ययुग की आरंभ होता है !

कलयुग वैसे तो सब से शापित युग बताया गया है, लेकिन कलयुग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कलयुग में सिर्फ एक दिन किया हुआ धर्म का काम सत्ययुग में 10 वर्ष त्रेतायुग में1 बर्ष और द्वापर युग में 1 माह किए गए धर्म के बराबर होता है और इस कलयुग में हरि का नाम लेने से ही मुक्ति मिल जाती है !

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