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फ्रांसीसी क्या है? फ्रांसीसी क्रांति के क्या कारण थे?

फ्रांसीसी क्या है?आज हम मुक्ति, स्वतंत्रता, और समानता को सहज ,सुलभ  और  सामान्य मान कर चलते हैं ! लेकिन हमें याद रखना चाहिए, कि इन सब का भी एक इतिहास रहा है ! फ्रांसीसी क्रांति के जरिए आपको इस इतिहास के एक हिस्से को समझने में मदद मिलेगी ! फ्रांसीसी क्रांति ने फ्रांस में राजतंत्र को समाप्त कर दिया था ! विशेष अधिकारों पर आधारित व्यवस्था से शासन की एक नई व्यवस्था उदित हुई ! क्रांति के दौरान तैयार किया गया मानवाधिकार घोषणापत्र एक नए युग के आगमन का द्योतक था ! 

सबके एक समान अधिकार होते हैं और हर व्यक्ति बराबरी का दावा कर सकता है ! यह सोच राजनीति की नई भाषा का हिस्सा बन गई ! समानता और स्वतंत्रता की यह सोच नए युग का केंद्रीय विचार थे ! लेकिन विभिन्न देशों में इन विचारों को अलग-अलग रूपों में समझा और साधा गया !  तो चलिए आज इस आर्टिकल में हम जानते हैं फ्रांसीसी क्रांति का इतिहास की पूरी जानकारी

फ्रांसीसी क्या है? फ्रांसीसी क्रांति के क्या कारण थे

14 जुलाई 1789 की सुबह पेरिस में आतंक का माहौल था ! सम्राट लुई-16 ने सेना को शहर में घुसने का आदेश दे दिया था ! अफवाह थी कि वह सेना को नागरिकों पर गोलिआं चलाने के आदेश देने वाला है ! लगभग 7,000 मर्द और औरतें टाउन हॉल के सामने एकत्र हुए और उन्होंने एक जन सेना का गठन करने का निर्णय लिया ! हथियारों की खोज में में बहुत से सरकारी भवनों में जबरन प्रवेश कर गए ! अंततः सैकड़ों लोगों का एक समूह पेरिस के पूर्व विभाग की ओर चल पड़ा और बेस्टील किले की जड़ को तोड़ डाला ! जहां भारी मात्रा में गोला-बारूद मिलने की संभावना थी ! हथियारों पर कब्जे के सशस्त्र लड़ाई में बास्तील का कमांडर मारा गया और कैदी छुड़ा लिया गए ! हालांकि इन कैदियों की संख्या केवल 7 थी !

सम्राट की निरंकुश शक्तियों का प्रतीक होने के कारण बास्तील किला लोगों की घृणा का केंद्र बन गया था ! इसीलिए किले को ढहा दिया गया और उसके अबशेष बाजार में उन लोगों को भेज दिए गए,जो इस ध्वंस को बतौर स्मृति चिन्ह संजना चाहते थे ! 

इस घटना के बाद कई दिनों तक पैरिस तथा देश के देहाती क्षेत्रों में कई और संघर्ष भी हुए ! अधिकांश जनता पावरोटी की महंगी कीमतों का विरोध कर रही थी !

बाद में इस दौर का अध्ययन करते हुए इतिहासकारों ने इसे एक लंबे घटनाक्रम की ऐसी शुरुआती कड़ियों के रूप में देखा, जिनका परिणाम फ्रांस के सम्राट को फांसी दिए जाने के रूप में निकला ! हालांकि उस समय अधिकांश लोगों को ऐसे नतीजे की उम्मीद नहीं थी ! ऐसा क्यों और कैसे हुआ आइए जानते हैं ! 

फ्रांसीसी क्या है? फ्रांसीसी क्रांति के क्या कारण थे?
 फ्रांसीसी क्रांति 

848 की फ्रांसीसी क्रांति के क्या कारण थे सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में  

लुई-16th के शासनकाल में फ्रांस ने अमेरिका के 13 उपनिवेशकों को साझा शत्रु ब्रिटेन से आजाद कराने में सहायता की थी ! इस युद्ध के चलते फ़्रांस में  10 अरब लिब्रे से भी अधिक का कर्ज और जुड़ गया ! जबकि उस पर पहले से ही 2 अरब लिब्रे का बोझ चढ़ा हुआ था ! सरकार के करदाता अब 10% ब्याज की मांग करने लगे !

फल स्वरुप फ्रांसीसी सरकार अपने बजट का बहुत बड़ा हिस्सा दिनों दिन बढ़ते जा रहे कर्ज को चुकाने पर मजबूर थी ! अपने नियमित खर्चों जैसे सीना के रखरखाव, राजदरबार, सरकारी कार्यालयों, या विश्वविद्यालयों को चलाने के लिए फ्रांसीसी सरकार करो मैं वृद्धि के लिए बाध्य हो गई ! पर यह कदम ही ना काफी था !

18वीं सदी में फ्रांसीसी समाज 3 स्टेट्स में बटा था और केवल तीसरे स्टेट के लोग यानि आम जनता को टैक्स देना होता था ! पहले स्टेट में पादरी बर्ग, दूसरे स्टेट में कुलीन वर्ग, और तीसरे स्टेट में अमीर लोग, बड़े व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान और कारीगर, छोटे किसान, भूमिहीन, मजदूर तथा नौकर भी होते थे !

यानी तीसरे स्टेट में अमीर भी थे और गरीब भी ! पहले दो एस्टेट कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग के लोगों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे ! इनमें से सबसे महत्वपूर्ण विशेषाधिकार था, राज्य को दिए जाने वाले करो से छूट ! यानी कि इन लोगों को कोई टैक्स नहीं देना होता था !

कुलीन वर्ग को कुछ अन्य सामंती विशेषाधिकार भी हासिल थे ! वह किसानों से सामंती-कर भी वसूल करते थे ! किसान अपने स्वामी की सेवा स्वामी के घर एवं खेतों में काम करना, सैनी सेवाएं देना, अथवा सड़कों के निर्माण में सहयोग आदि करने के लिए बाधित थे ! चर्च भी किसानों से करो का एक हिस्सा टाइद यानी एक धार्मिक कर के रूप में वसूलते थे ! ऊपर से तीसरे स्टेट के तमाम लोगों को सरकार को तो कर चुका ना ही होता था !

इसके अलावा कुछ अप्रत्यक्ष कर भी शामिल थे ! जो तीसरे स्टेट को देने होते थे ! अप्रत्यक्ष कर नमक और तंबाकू जैसी रोजाना उपभोग की वस्तुओं पर लगाया जाता था ! इस प्रकार राज्य के वित्तीय कामकाज का सारा बोझ करो के माध्यम से आम जनता वहन करती थी ! 

फ्रांसीसी क्रांति के आर्थिक कारण क्या थे

1-लंबे समय तक चले युधों के कारण फ़्रांस के वित्तीय संसाधन नष्ट हो चुके थे !

2-वर्साय के विशाल महल और राज दरबार की शान और शौकत बनाए रखने के लिए फिजूल खर्च !

3 -फ्रांस के ऊपर बढ़ती कर्ज का बोझ !

4- फ्रांसीसी सरकार का करो मैं वृद्धि !

5- केवल एक बर्ग के लोग यानि तीसरे स्टेट के आम जनता को टैक्स देना होता था 

6-कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग के लोगों को कर से छूट का विशेष अधिकार देना 

7-कुलीन बर्ग को किसानो पर सामंती कर वसूल का अधिकार

8-किसानो को अपने स्वामी के कामकाज करने केलिए बाधित होना

9-चर्चो को किसानो पर धार्मिक कर वसूल करने का अधिकार 

10 - नमक और तंबाकू जैसी रोजाना उपभोग की वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर लगाना 

11-सम्राट लुइ 16 की निरंकुश शक्तियों का प्रतीक होने के कारण बास्तील किला लोगों की घृणा का केंद्र बन गया था 

सन 1774 में बार्बन राजवंश के लुई-16 फ्रांस की राजगद्दी पर आसीन हुआ ! उस समय उसकी उम्र केवल 20 वर्ष थी और उसका विवाह ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी एंटोइनेट से हुआ था ! राज्य आरोहण के समय उसने राजकोष खाली पाया !क्यों की लंबे समय तक चले युधों के कारण फ़्रांस के वित्तीय संसाधन नष्ट हो चुके थे ! वर्साय के विशाल महल और राज दरबार की शान और शौकत बनाए रखने के लिए फिजूलखर्ची का बहुत अलग से था !

फ्रांसीसी क्रांति की विरासत क्या है

फ़्रांस की जनसंख्या सन 1715 में 2.3 करोड़ थी जो सन 1789 में बढ़कर 2.8 करोड़ हो गए ! परिणाम स्वरूप अनाज उत्पादन की तुलना में उसकी मांग काफी तेजी से बढ़ी ! अधिकांश लोगों के मुख्य खाद्य पावरोटी की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई ! अधिकतर कामगार कारखानों में मजदूरी करते थे और उनकी मजदूरी मालिक तय करते थे !

लेकिन मजदूरी महंगाई की दर से नहीं बढ़ रही थी ! फल स्वरुप अमीर, गरीब की खाई चौड़ी होती गई ! स्थिति तब और बत्तर  हो जाती थी , जब सूखे ओलों के प्रकोप से पैदावार भी नष्ट हो जाती थी ! इससे रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाता था ! ! ऐसे जीविका संकट प्राचीन राजतंत्र के दौरान फ्रांस में काफी आम बात थी !  

मध्यम वर्ग ने की विशेष अधिकारों के अंत की कल्पना 

पहले भी कर बढ़ने एवं अकाल के समय किसान और कामगार विद्रोह कर चुके थे ! परंतु उनके पास सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव लाने के लिए साधन एवं कार्यक्रम नहीं थे ! यह जिम्मेदारी तीसरे स्टेट के उन समूह ने उठाई जो समृद्ध और शिक्षित होकर नए विचारों के संपर्क में आ सके थे !

18वीं सदी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ ! जिसे मध्यमवर्ग कहा गया ! जिसने फैलती समुद्री व्यापार और ऊनि तथा रेशमी वस्त्रों के उत्पादन के बल पर संपत्ति अर्जित कर ली थी ! उनि और रेशमी कपड़ों का यातो निर्यात किया जाता था, या समाज के समृद्ध लोगों से खरीद लेते थे ! तीसरे स्टेट में इन सौदागरों एवं निर्माताओं के अलावा प्रशासनिक सेवा व वकील जैसे पेशेवर लोग भी शामिल थे ! 

यह सभी पढ़े लिखे थे और इनका मानना था, कि समाज के किसी भी समूह के पास जन्मजात विशेषाधिकार नहीं होने चाहिए ! किसी भी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत का आधार उसकी योग्यता ही होनी चाहिए 1  स्वतंत्रता समान नियमों तथा समान अवसरों के विचार पर आधारित समाज की परिकल्पना जॉन लॉक [john locke ] और जीन जैक्स रूसो [jean jecques rousseau ] जैसे दार्शनिकों ने प्रस्तुत की थी 1 अपने टू ट्रीटाइज ऑफ गवर्नमेंट में लॉक ने राजा के दैवी और निरंकुश अधिकारों के सिद्धांत का खंडन किया था ! 

रूसो ने इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए, जनता और उसके प्रतिनिधियों के बीच एक सामाजिक अनुबंध पर आधारित सरकार का प्रस्ताव रखा ! मॉन्टेस्क्यू [Monteque ] ने द स्पिरिट ऑफ द लॉस नामक एक रचना में सरकार के अंदर विधायिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका के बीच सत्ता विभाजन की बात कही!

जब संयुक्त राज्य अमेरिका में 13 उपनिवेश को ब्रिटेन से खुद को आजाद घोषित कर दिया, तो उहाँ ऐसी मॉडल की सरकार बने फ्रांस के राजनीतिक चिंतकों के लिए अमेरिकी संविधान और उसने दी गई व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी प्रेरणा का एक महत्वपूर्ण स्रोत था !

ऊपर की लेख से हम जान चुके हैं, कि किन कारणों से लुई-16th कर बढ़ा दिए थे ! क्या आप सोच सकते हैं, कि उसने ऐसा कैसे किया होगा ! प्राचीन राजतंत्र के तहत फ्रांसीसी सम्राट अपनी मर्जी से कर नहीं लगा सकता था ! इसके लिए उसे स्टेट्स जनरल यानी प्रतिनिधि सभा की बैठक बुलाकर नई करो कि अपने प्रस्तावों पर मंजूरी लेनी पड़ती थी ! स्टेट जनरल एक राजनीतिक संस्था थी ! जिसमें तीनों स्टेट्स अपने अपने प्रतिनिधि भेजते थे ! लेकिन सम्राट ही यह फैसला करता था, कि इस संस्था की बैठक कब बुलाई जाए ! इसकी अंतिम बैठक सन 1614 में बुलाई गई थी ! 

फ्रांसीसी सम्राट लुईस-16th  ने 5 मई सन 1789 को नहीं नयी करों की प्रस्ताव के अनुमोदन के लिए स्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई ! प्रतिनिधियों की मेजबानी के लिए वर्साय के एक आलीशान भवन को सजाया गया ! पहले और दूसरे स्टेट ने इस बैठक में अपने 300-300 प्रतिनिधि भेजें !जो आमने-सामने की कतारों बैठाये गए थे  ! तीसरे स्टेट के 600 प्रतिनिधि उनके पीछे खड़े किए गए थे !  तीसरे स्टेट का प्रतिनिधित्व इसके अपेक्षाकृत समृद्ध एवं शिक्षित वर्ग कर रहे थे !  किसानों और तमाम कारीगरों का सभा में प्रवेश वर्जित था ! 

फिर भी लगभग 40,000 पत्रों की शिकायतों एवं मांगों की सूची बनाई गई ! जिसे उनके प्रतिनिधि अपने साथ लेकर आए थे ! स्टेट्स जनरल के नियमों के अनुसार प्रत्येक वर्ग को एक मत देने का अधिकार था ! इस बार लुई-16th इसी प्रथा का पालन करने वाले थे ! परंतु तीसरे वर्ग के प्रतिनिधियों ने मांग रखी कि अबकी बार पूरी सभा द्वारा मतदान कराया जाना चाहिए ! जिसमें प्रत्येक सदस्य को एक मत देने का अधिकार होगा !

यह एक लोकतांत्रिक सिद्धांत था ! जिसे मिसाल के तौर पर रूसो ने अपनी पुस्तक द सोशल कॉन्ट्रैक्ट में प्रस्तुत किया था ! जब सम्राट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तो तीसरे स्टेट के प्रतिनिधि विरोध जताते हुए सभा से बाहर चले गए ! 

तीसरे स्टेट के प्रतिनिधि खुद को संपूर्ण फ्रांसीसी राष्ट्र का प्रवक्ता मानते थे ! 20 जून 1789  को यह प्रतिनिधि वर्साय के इंडोर टेनिस कोर्ट में जमा हुए ! उन्होंने अपने आप को नेशनल असेंबली घोषित कर दिया और शपथ ली कि जब तक सम्राट की शक्तियों को कम करने वाला संविधान तैयार नहीं किया जाएगा, तब तक असेंबली भंग नहीं होगी ! 

उनका नेतृत्व मेरेबो [Merabeau ] और अब्बे सीएस [Abbe Sieyes ] ने किया !  मेरेबो [Merabeau ] का जन्म कुलीन परिवार में हुआ था ! लेकिन वह सामंती विशेषाधिकार वाले समाज को खत्म करने की जरूरत से सहमत थे !  उसने एक पत्रिका निकाली और वर्साय की जुटी भीड़ के समक्ष जोरदार भाषण भी दिया ! अब्बे सीएएस मूलतः पादरी था और उसने तीसरा स्टेट क्या है नामक शीर्षक से एक अत्यंत प्रभावशाली प्रचार पुस्तिका यानी पंपलेट लिखा ! जिस वक्त नेशनल असेंबली संविधान का प्रारूप तैयार करने में व्यस्त थी, पूरा प्लान आंदोलित हो रहा था ! 

कड़ाके की ठंड के कारण फसल मारी गई थी और पावरोटी की कीमतें आसमान छू रही थी ! बेकरी मालिक स्थिति का फायदा उठाते हुए जमाखोरी में जुटे थे ! बेकरी की दुकानों पर घंटों के इंतजार के बाद गुस्साई औरतों की भीड़ ने दुकान पर धावा बोल दिया ! दूसरी तरफ सम्राट ने सेना को पेरिस में प्रवेश करने का आदेश दे दिया था! 

उधर क्रोधित भीड़ ने 14 जुलाई को बास्तील के किले पर धावा बोलकर उसे नेस्तनाबूद कर दिया ! देहाती इलाकों में गांव-गांव में अफवाह फैल गई की जागीरों की मालिकों ने भाड़े पर गुंडों और लुटेरों के गिरोह को बुला लिया है ! जो पक्की फसलों को तबाह करने निकल पड़े हैं !  कई जिलों में भय से आतंकित होकर किसानों ने कुदालों और बेल्टों से ग्रामीण किलो पर आक्रमण कर दिया ! उन्होंने अन्न के भंडारों को लूट लिया और लगान संबंधी दस्तावेजों को जलाकर राख कर दिया ! 

कुलीन बड़ी संख्या में अपनी जागीर है छोड़कर भाग गए ! बहुत होने तो पड़ोसी देशों में जाकर शरण ली ! अपनी विद्रोही प्रजा की शक्ति का अनुमान करके लुईस-16th ने अंततः नेशनल असेंबली को मान्यता दे दी और यह भी मान लिया कि उसकी सत्ता पर अब से संविधान का अंकुश रहेगा !

4 अगस्त 1789 की रात को असेंबली ने करो,कर्तव्य और बंधनों वाली सामंती व्यवस्था के उन्मूलन का आदेश पारित किया ! पादरी बर्ग के लोगों को भी अपने विशेष अधिकारों को छोड़ देने के लिए विवश किया गया ! धार्मिक कर समाप्त कर दिए गए और चर्च के स्वामित्व वाली भूमि भी जब्त कर ली गई ! इस प्रकार कम से कम 20 अरब लिब्रे की संपत्ति सरकार के हाथ में आ गई ! 

फ्रांस बना संवैधानिक राजतंत्र 

नेशनल असेंबली ने शन 1791 में संविधान का प्रारूप पूरा कर लिया ! इसका मुख्य उद्देश्य था सम्राट की शक्तियों को सीमित करना ! एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रीकृत होने के बजाय अब इन शक्तियों को विभिन्न संस्थाओं, विधायिका, कार्यपालिका, एवं न्यायपालिका में बैठकर हस्तांतरित कर दिया गया ! और इस प्रकार फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की नींव पड़ी !

फ्रांसीसी क्रांति का यूरोप पर क्या प्रभाव पड़ा?

आगे चलकर लुई -16th को न्यायलय द्वारा देशद्रोह के आरोप में मौत की सजा सुना दी गई ! 21 जनवरी 1793 को [please  the law concord]  में उसे सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई ! जल्द ही रानी मैरी अन्टोनियेट का भी यही हस्र  हुआ ! सरकार के स्वरूप में इन सभी परिवर्तनों के दौरान स्वतंत्रता विधि सम्मत समानता और प्रभुत्व प्रेरक आदर्श बने रहे !

इन मूल्यों ने आगामी सदी में ना सिर्फ फ्रांस बल्कि बाकी यूरोप के राजनीतिक आंदोलनों को भी प्रेरित किया ! स्वतंत्रता और जनवादी अधिकारों के विचार फ्रांसीसी क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण विरासत थे  ! यह विचार 19वीं सदी में फ्रांस से निकलकर बाकी यूरोप में फैले !

उनके कारण वह सामंती व्यवस्था का नाश हुआ ! औपनिवेशिक समाजों ने राज्य की स्थापना करने के आंदोलनों में दासता से मुक्ति के विचार को नई परिभाषा दी ! टीपू सुल्तान और राजा राममोहन रॉय क्रांतिकारी फ्रांस में उपजे विचारों से प्रेरणा लेने वाले दो ठोस उदाहरण थे !

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