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जीरो [शून्य] का आविष्कार किसने और कब किया ?History of Zero in Hindi !

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जीरो का अविष्कार किसने किया ,यह कहना गलत नहीं होगा, गणित में शून्य का आविष्कार क्रांतिकारी था !शून्य कुछ भी नहीं, या कुछ नहीं होनेका अवधारणा का प्रतीक है !यह एक आम व्यक्ति को गणित में सक्षम होने  का क्षमता प्रदान करता है !

इस से पहले गणितज्ञों को सरल अंक गणितीय गणना करने में भी संघर्ष करना पड़ता था आजकल शून्य का प्रयोग, एक संकेतिक प्रतीक और एक अवधारणा दोनों के रूप में, जटिल समीकरणों को सुलझा ने में, तथा गणना करने में किया जाता है ! इसी तरह ही शून्य कंप्यूटर का मूल आधार भी है !

जीरो [शून्य] का आविष्कार किसने और कब किया

भारत में शून्य पूरी तरह से पांचवी शताब्दी के दौरान विकसित हुआ था ! 5 वीं शताब्दी में ही पहली बार भारत में शून्य की खोज हुई थी !वास्तव में भारत की उप महाद्वीप में गणित में शून्य की स्थान बहुत महत्वपूर्ण है ! तीसरी और चौथी शताब्दी की बख्शाली पांडुलिपि में पहली बार शून्य दिखाई दिया था !

ऐसा कहा जाता है, 1881 में एक किसान ने पेशावर[अब यह पाकिस्तान में है] बख्शाली गांव में, इस दस्तावेज से जुड़े पाठ को खोज निकाला था ! यह काफी जटिल दस्तावेज है ! क्योंकि यह सिर्फ एक दस्तावेज की टुकड़ा नहीं है, बल्कि इसमें बहुत से टुकड़े हैं,जो कई शताब्दियों पहले लिखी गई थी !

रेडियो कार्बन डेटिंग टेक्निक की मदद से जो आयु निर्धारित करने के लिए, कार्बनिक पदार्थों में कार्बन आइसोटोप सामग्री को मापने की एक विधि है, इससे यह पता चलता है, की बख्शाली पांडुलिपि में कई ग्रंथ है ! सबसे पुराना हिस्सा 224 से 383 ईसवी का है, उससे नया हिस्सा 680 से 779 ईसवी का है, और सबसे नया हिस्सा 885 से 993  ईसवी का है ! 

इस पांडुलिपि में सनोबर पेड़ के 70 पत्ते और बिंदु के रूप में सैकड़ों शून्य को दिखाई गया है ! उस समय यह डॉट्स संख्यात्मक रूप में शून्य नहीं थे !बल्कि 101 और 1100 जैसे बड़े संख्याओं के निर्माण के लिए इसे स्थान निर्धारण अंक के रूप में इस्तेमाल किया गया था !इस दस्तावेजों की सहायता से व्यापारियों को गणना करने में मदद मिलती थी !


शून्य का आविष्कार किसने किया ?

कुछ और प्राचीन संस्कृतिया है, जो कि शून्य को स्थान निर्धारक संख्या के रूप में इस्तेमाल करते थे !जैसे कि बेबीलोन के लोग शून्य को 2 पत्तों के रूप में इस्तेमाल करते थे !माया संस्कृति के लोगों ने इसे सेल की संख्या के रूप में इस्तेमाल करते थे ! इसीलिए प्राचीन सभ्यताओं को कुछ भी नहीं के अवधारणा पता थी ! लेकिन उनके पास इसे दर्शाने के लिए कोई प्रतीत नहीं था !

भारत में जीरो का आविष्कार कब हुआ था ?

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार भारत के ग्वालियर में नौ शताब्दी के एक मंदिर के शिलालेख में,शून्य को सबसे पुराने रिकॉर्ड के रूप में माना जाता है ! शून्य यानि भारत में संख्या पद्धति [गणना ] का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है ! यहां तक की पहले गणितीय समीकरणों को कविता के रूप में गाया जाता था ! आकाश और आंतरिक जैसे शब्द कुछ भी नहीं अर्थात संज्ञा के प्रतिनिधित्व करते हैं ! एक भारतीय विद्वान पिंगला ने द्विआधारी संख्या का  इस्तेमाल किया था !और वह पहले थे, जिन्होंने जीरो के लिए संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल किया था  !

628 ईसवी में ब्रह्मगुप्त नामक एक महान विद्वान और गणितज्ञ ने, पहली बार शून्य [जीरो ] के सिद्धांतों को परिभाषित किया ! और इसके लिए एक प्रतीक या चिन्ह विकसित किया, जो कि संख्याओं के नीचे दिए गए एक डॉट [बिंदु ] के रूप में होता था !उन्होंने गणितीय संक्रियाएं अर्थात जोड़ और घटाव के लिए शून्य के प्रयोग से संबंधित नियम भी लिखे हैं !

इसके बाद प्रख्यात  गणितज्ञ और खगोल शास्त्री आर्यभट्ट ने दशमल प्रणाली में पहलीबार शून्य का प्रयोग किया था ! यह स्पष्ट है शून्य भारत का एक महत्वपूर्ण आविष्कार है ! जिस ने गणित को एक नई दिशा दी, और इसे अधिक सरल बना दिया !

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